Utkarsh_bauddh
1 जनवरी को शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन मुख्य रूप से भीमा-कोरेगांव युद्ध (1818) की स्मृति में मनाया जाता है। यह युद्ध 1 जनवरी 1818 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के पास भीमा नदी के किनारे स्थित कोरेगांव में लड़ा गया था। इस युद्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना और पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना आमने-सामने थीं।
इस युद्ध का ऐतिहासिक महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि अंग्रेज़ी सेना में बड़ी संख्या में महार (दलित) समाज के सैनिक शामिल थे। उस समय पेशवा शासन में दलितों के साथ अत्यंत भेदभाव किया जाता था। उन्हें गांव में रहने, हथियार रखने, शिक्षा पाने और सम्मानजनक जीवन जीने से वंचित रखा गया था। ऐसे में जब महार सैनिकों ने पेशवा की बड़ी सेना का डटकर सामना किया, तो इसे सामाजिक अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक माना गया।
भीमा-कोरेगांव की लड़ाई में संख्या के लिहाज़ से पेशवा की सेना कहीं अधिक थी, फिर भी अंग्रेज़ी सेना के साथ लड़े महार सैनिकों ने साहस, अनुशासन और रणनीति से मुकाबला किया। अंततः पेशवा की सेना पीछे हटने को मजबूर हुई। इसी जीत की याद में अंग्रेज़ों ने 1822 में एक विजय स्तंभ (Victory Pillar) का निर्माण कराया, जिस पर शहीद सैनिकों के नाम अंकित हैं।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस युद्ध को दलित समाज के आत्मसम्मान और साहस का प्रतीक माना। उनके अनुयायी हर वर्ष 1 जनवरी को कोरेगांव जाकर श्रद्धांजलि देते हैं। समय के साथ यह दिन सामाजिक समानता, मानव अधिकार और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक बन गया।
हालांकि, इस दिन को लेकर मतभेद भी हैं। कुछ लोग इसे अंग्रेजों की जीत से जोड़कर देखते हैं, जबकि कई लोग इसे सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ खड़े होने का प्रतीक मानते हैं। इसलिए यह दिन केवल ऐतिहासिक नहीं बल्कि सामाजिक और वैचारिक महत्व भी रखता है।
इस प्रकार, 1 जनवरी को शौर्य दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि यह दिन साहस, आत्मसम्मान, और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की याद दिलाता है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जिन्हें लंबे समय तक दबाया गया था।
