Utkarsh_bauddh
यह भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है और इसका पर्यावरण, जल, जलवायु और मानव जीवन से गहरा संबंध है। अरावली पर्वत दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैला हुआ है और उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन में इसकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।
सबसे पहला कारण पर्यावरण संरक्षण है। अरावली पर्वत एक प्राकृतिक ढाल की तरह काम करता है, जो रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकता है। यदि अरावली नष्ट होती है तो थार रेगिस्तान का प्रभाव हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक बढ़ सकता है। इससे भूमि बंजर हो सकती है और खेती पर बुरा असर पड़ेगा।
दूसरा बड़ा कारण जल संरक्षण है। अरावली क्षेत्र में अनेक जलस्रोत, झीलें और भूमिगत जल भंडार मौजूद हैं। यह पर्वत वर्षा के पानी को रोककर उसे जमीन के अंदर जाने में मदद करता है, जिससे भूजल स्तर बना रहता है। खनन और जंगलों की कटाई से यह व्यवस्था बिगड़ रही है, जिसके कारण पानी की गंभीर कमी हो रही है।
तीसरा कारण वायु प्रदूषण नियंत्रण है। अरावली पर्वत और इसके जंगल दिल्ली–एनसीआर क्षेत्र के लिए “ग्रीन लंग्स” की तरह काम करते हैं। यह धूल, प्रदूषण और गर्म हवाओं को रोकने में मदद करता है। यदि अरावली खत्म होती है तो दिल्ली और आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण और भी खतरनाक स्तर तक बढ़ सकता है।
चौथा कारण जैव विविधता (Biodiversity) है। अरावली पर्वत में कई प्रकार के पेड़-पौधे, पक्षी और जानवर पाए जाते हैं। यह कई दुर्लभ और स्थानीय प्रजातियों का घर है। पहाड़ों के कटाव और अवैध खनन से इन जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
पाँचवाँ और महत्वपूर्ण कारण अवैध खनन और शहरीकरण है। अरावली क्षेत्र में पत्थर, रेत और खनिजों के लिए बड़े पैमाने पर अवैध खनन हुआ है। साथ ही, रियल एस्टेट और सड़कों के निर्माण ने पहाड़ों को तेजी से नष्ट किया है। इससे भूस्खलन, बाढ़ और तापमान बढ़ने जैसी समस्याएँ सामने आ रही हैं।
अंत में, लोग अरावली पर्वत को इसलिए बचाना चाहते हैं क्योंकि यह केवल पहाड़ नहीं है, बल्कि जलवायु संतुलन, जीवन सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा हुआ प्राकृतिक धरोहर है। अरावली को बचाना मतलब प्रकृति, पानी और मानव जीवन को बचाना।
