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चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ ने यूजीसी के नए नियमों / बिल 2026 को लेकर साफ प्रतिक्रिया दी है, खासकर तब जब इस बिल को लागू करने पर विरोध गहरा रहा है। नए यूजीसी नियमों में जाति-आधारित बराबरी (equity) उपायों को बढ़ावा देने वाले प्रावधान हैं, जिससे कुछ समूहों को सीधे प्रतिनिधित्व मिलता है और शिकायत निवारण समितियों में SC-ST-OBC सदस्यों को शामिल करना अनिवार्य है। आलोचकों का कहना है कि नए नियम सवर्ण वर्गों को जगह नहीं देते और ‘भेदभाव के नाम पर नए भेद’ पैदा कर सकते हैं, इसीलिए कई जगह छात्र और समाज विरोध कर रहे हैं। �
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आजाद ने कहा है कि सरकार ने पहले भेदभाव रोकने के लिए नियम बनाए, लेकिन जब उसके स्वयं पार्टी के लोगों ने विरोध किया, तो सरकार कोर्ट में पैरवी ढीली कर दी। उन्होंने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों में जल्दी-जल्दी वक्रीकरण या कमजोर वर्गों से जुड़े मामलों में देर होती है, जबकि कुछ फैसले जल्दी आते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि न्याय प्रक्रिया में असमानता है। आजाद ने जोर देकर कहा कि जातिवाद खत्म किये बिना बच्चों की जानों की कीमत पर शिक्षा-व्यवस्था ठीक नहीं हो सकती, और यह बदलाव सिर्फ नाम मात्र का है। उन्होंने कहा कि सरकार को वास्तविक जातिविहीन समाज बनाने के लिए कदम उठाने चाहिये, सिर्फ नियम बदलने से काम नहीं चलेगा। �
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वास्तव में, संसद और सड़कों पर UGC के नए नियम के खिलाफ विरोध तेज हुआ है। कई छात्रों ने UGC नियमों को “विभाजनकारी” और “असमान” बताते हुए प्रदर्शन किये हैं; कुछ स्थानों पर छात्रों ने काले बैंड पहने और धारा मार्च निकाला। Kanpur में Chandra Shekhar Azad Agricultural University के छात्रों ने भी विरोध किया। इसके अलावा, कई लोग और संगठनों ने कानून के खिलाफ बयान जारी किये हैं, सरकार से इसके वापस लेने या संशोधन की मांग कर रहे हैं। �
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आजाद की प्रतिक्रिया इस व्यापक विरोध की पृष्ठभूमि में आई है, जहां कुछ समूहों को लगता है कि यह कानून सामाजिक सद्भाव के बजाय विभाजन को बढ़ावा देगा। उन्होंने कहा कि जब तक जातिवाद और भेदभाव के मामलों को जड़ से मिटाया नहीं जाता, तब तक शिक्षा और समाज दोनों में न्याय नहीं आएगा। आजाद का फोकस यह रहा है कि कानून का उद्देश्य बड़ा हो सकता है, लेकिन उसका क्रियान्वयन और प्रभाव न्यायसंगत होना चाहिए। �
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संक्षेप में, चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ ने यूजीसी बिल पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है, अदालत और सरकार दोनों को जातिगत भेदभाव के खिलाफ प्रभावी कदम उठाने का आग्रह किया है, और कहा है कि केवल नए नियम बनाना पर्याप्त नहीं है जब तक वास्तविक सामाजिक समानता नहीं आती। �
